संदेश

अक्टूबर, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

प्रेत आत्मा न होने के 30 तर्क"

चित्र
" प्रेत आत्मा न होने के 30 तर्क" ✍️ लेखक : विनय तिवारी 1). हर दिन लाखो मृत्यु होती है. इस तरह तो भूतों से भर जाता संसार  2). शरीर का इम्यून सिस्टम सूक्ष्म जीव को अन्दर आने नहीं देता फिर, इतना बड़ा शरीर कैसे अन्दर आ पायेगा 3). पागलौ को भूत क्यों नहीं लगते  4). मरने के बाद ऊर्जा निकलती है तब वह प्रेत आत्मा अपनी भौतिक आकृति में कैसे आ सकती है।  5). कहते हैं आत्मा 84 हजार योनियों से गुजरता है तब फिर मनुष्य योनी में ही व्यक्ति प्रेत क्यों बनते 6). मरते तो गाय, भैंस, बकरी, हाथी और सभी जीव भी है फिर इनके भूत क्यो नहीं लगते है। 7). हर तान्त्रिक आपके भूतकाल को बताता और आपका विश्वास जीत लेता है क्या हैं वह तान्त्रिक आइंस्टीन के ऊर्जा संरक्षण के नियम को सिद्ध करके आपका विश्वास जीत सकता है। वह भी तो भूत काल की घटना है। 8). किसी भूत की भाषा स्पेशल शुद्ध हिन्दी क्यों हो जाती है जबकि उस व्यक्ति को कभी इस प्रकार बोलते देखा ही नहीं गया था। 9). जबकि कण-कण मे भगवान का वास माना जाता है फिर भूत का वास किस स्थान पर रहेगा 10). जब मृत्यू अटल सत्य है फिर डर किस बात का है। 11). जब व...

कर्मपथ और दुर्घटना

चित्र
कर्मपथ और दुर्घटना (अनुभव, विज्ञान और दर्शन) ✍️लेखक : विनय तिवारी भाग 1 : अनुभव कर्मपथ पर चलते हुए जीवन में अनेक व्याधियाँ आती हैं — कभी मानसिक, कभी शारीरिक, और कभी परिस्थितिजन्य। इन्हीं में से एक व्याधि है — दुर्घटना। दुर्घटना कभी किसी को बताकर नहीं आती, उसका समय और स्थान अनिश्चित होता है। वह जैसे जीवन की राह में अचानक रखी गई एक परीक्षा हो, जहाँ चेतना, संयम और भाग्य — तीनों एक साथ परखे जाते हैं। वर्ष 2023 की एक दोपहर, मैं बाइक से शिवाजी नगर से लौट रहा था। सड़क शांत थी, पर नियति सक्रिय। अचानक सामने से एक वाहन आया, और मैंने झटके से ब्रेक लगाया। अगले ही क्षण मैं सड़क पर गिर पड़ा — सिर ज़मीन से टकराया, पर सौभाग्यवश सिर पर हेलमेट था। चेहरे पर चोटें आईं, किन्तु जीवन सुरक्षित रहा। उस पल सब कुछ थम गया था — आवाज़ें जैसे गायब हो गईं, दृष्टि कुछ क्षण के लिए शून्य में विलीन। फिर धीरे-धीरे शरीर ने स्वयं को पुनः जगाया — सांस लौटी, धड़कनें स्थिर हुईं, और भीतर से एक सूक्ष्म स्वर गूंजा — “जीवन अभी बाकी है।” यह सब कुछ, एक सेकंड के अंदर हुआ। उस क्षण ने मुझे यह सिखाया कि दुर्घटना केवल शरीर की...

कहानी: "रामसेवक — जीवन का लोकगीत"

चित्र
कहानी: "रामसेवक — जीवन का लोकगीत" लेखक: विनय तिवारी 23 अगस्त 1930 की प्रातः बेला थी। ग्राम बुधेड़ा, जिला दतिया एक बालक ने जन्म लिया। घर में मंगल ध्वनि गूंजी — नाम रखा गया रामसेवक। माता तुलसी और पिता पन्ना के चेहरे पर अपार आनंद था, जैसे ईश्वर ने उनके जीवन को धन्य कर दिया हो। रामसेवक तीन भाइयों और एक बहन में सबसे छोटे थे। बचपन में ही जीवन ने कठिनाई की चादर ओढ़ा दी — बड़े भाई ब्रजकिशोर हनुमानजी की अनन्य भक्त थे। उन्होंने गांव में ही हनुमान मंदिर (इच्छापूर्ण हनुमान) का निर्माण करवाया। उनके बाल काल में ही बड़े भाई और माता-पिता स्वर्ग सिधार गए। बीच वाले भाई धनीराम 5 वर्ष की आयु में भी अचानक से गायब हो गए कुछ वर्षों बाद पता चला कोई साधु उन्हें ले गया था। अब वह बड़े हो चुके थे और पीतांबरा माई की सेवा करने लगे थे। अब इस नन्हे बालक को जीवन की नाव खुद खेनी थी। बहन चिरौंजी (जिनकी ससुराल गढ़ा गांव में थी) ने मां का रूप लिया। कभी बुधेड़ा, कभी गढ़ा — रामसेवक का बचपन दो गांवों की माटी में बीता। कभी नदी के घाट पर, कभी खेत की मेड़ पर — वे जीवन से जूझते हुए भी मुस्कुराते रहे। पढ़ा...

मंत्र और विश्वास

चित्र
🔶 मंत्र और विश्वास लेखक - विनय तिवारी  जहाँ शब्द नहीं, विश्वास बोलता है हर व्यक्ति जानता है कि मंत्रों में शक्ति होती है। परंतु प्रश्न यह है — मंत्र आखिर है क्या? वास्तव में मंत्र कोई रहस्यमयी जादू नहीं, बल्कि संस्कृत भाषा में किसी देवता की प्रशंसा मात्र है। जब हम कहते हैं —  “आप महान हैं, आप ही सर्वशक्तिमान हैं, आपके हाथों में धनुष है, कंधों पर शौर्य, गले में विशाल नाग है, सिर पर चंद्रमा है, आपने असुरों का संहार किया, सत्य की रक्षा की…” तो यह भी एक मंत्र ही है — बस अपनी भाषा में कहा गया। भगवान तब भी प्रसन्न होते हैं, क्योंकि उन्हें भाषा नहीं, भावना चाहिए। परंतु हम इसे मंत्र नहीं मानते, क्योंकि हमारा विश्वास मंत्र के शब्दों में है, उसके अर्थ या भाव में नहीं। और यहीं पूरी बात छिपी है — सारा खेल विश्वास का है। जब किसी बात, किसी शक्ति या किसी देवता में हमारा विश्वास पूर्ण हो जाता है, तो कार्य अपने आप होने लगते हैं। और फिर हम प्रसन्न होकर कहते हैं —  “मंत्र ने काम कर दिया।” पर वास्तव में, काम मंत्र ने नहीं, हमारे अटल विश्वास ने किया होता है।

🌼अधिक की चाहत

चित्र
🌼अधिक की चाहत ✍️ लेखक : विनय तिवारी  हम अधिक की चाहत में कम खो देते हैं। जितना मिला है, उतना किसी के लिए पर्याप्त नहीं होता — हर व्यक्ति उससे अधिक की इच्छा रखता है। प्राप्त वही पर्याप्त है, इस सिद्धांत को अपनाना चाहिए। जिस दृष्टि को संतुष्टि नहीं मिली, वह ज़िंदगी भर तृप्त नहीं हो पाएगा। जो प्राप्त हुआ है, उसी से समझौता करो, और अधिक पाने का प्रयत्न तो करो — पर यह मत सोचो कि सब आज ही मिल जाए। सफलता धीरे-धीरे मिलती है, कोई एक दिन में अमीर नहीं बनता। हानि आपके हाथ में है, जब चाहो उसे रोक सकते हो। लाभ आपके हाथ में नहीं है, वह तो तभी मिलेगा जब आप प्रयत्न करेंगे। एक दिन में पूरी ज़िंदगी की कमाई खत्म हो सकती है, पर एक दिन में कोई उतना धन नहीं कमा सकता जितनी उसे ज़रूरत है। अब एक कहानी — एक दिन एक सज्जन खाने बैठे। थाली में एक अंडा रखा था। अंडा देख कर मन में भाव जागा — “भोजन के लिए तो सब खाते हैं, क्यों न इसे भविष्य के लिए सजाऊं?” फिर खुद ही बोले — “नहीं-नहीं, इसे तो सेने दूँ। इससे चूजा निकलेगा, चूजा मुर्गि बनेगा, मुर्गि अंडा देगी, फिर मुर्गियाँ होंगी, फिर अंडे बिकेंगे, फिर पैसा ...

हानि : सफलता की जननी

चित्र
🧩हानि : सफलता की जननी ✍️लेखक : विनय तिवारी  हानि जीवन का कटु सत्य है। जिस व्यक्ति ने कभी कष्ट नहीं उठाया, वह सुख का स्वाद कभी नहीं जान सकता। जिसे कभी हानि नहीं हुई, वह सच्चे अर्थों में सफल भी नहीं हुआ। हानि ही मनुष्य को सफलता की राह दिखाती है। जिसने बड़ी हानि झेली, उसने ही बड़ा लाभ पाया। जो व्यक्ति जोखिम नहीं उठाता, वह जीवन में ठहराव का प्रतीक बन जाता है। अगर आप चाहते हैं कि जीवन केवल दाल-रोटी में कट जाए, तो आपके बच्चों का जीवन भी वैसा ही कटेगा। फिर कौन बनेगा मालिक? क्या केवल व्यापारी का बेटा ही व्यापारी बनेगा? क्या केवल नेता का बेटा ही नेता बनेगा? क्या नौकरीपेशा का बेटा ही नौकरी करेगा? हम बस देखते रहते हैं, आशा करते हैं — कि हमारा बच्चा इतना पढ़े कि नौकरी कर सके। पर सोचिए, आप उसे पढ़ाकर नौकर बनाना चाहते हैं! आप बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। उन्हें पूंजी (capital) दीजिए, सिखाइए कि वे मालिक बनें, नौकर नहीं। उनके मन में गुलामी का संस्कार मत भरिए। उन्हें पढ़ाइए ताकि वे लायक बनें, संस्कारी बनें, ना कि केवल आपकी शान या नाम बनकर रह जाएँ। पढ़ना है तो तैयारी IAS ...

प्रशंसा: एक धीमा ज़हर

चित्र
🪶 प्रशंसा: एक धीमा ज़हर ✍️ लेखक — विनय तिवारी किसी को जीतना है तो उसकी प्रशंसा करो। वह धीरे-धीरे अपनी समझ, अपनी सोच और कभी-कभी अपनी आत्मा तक आपके कदमों में रख देगा। और हां, यदि पुरुष किसी की प्रशंसा करे तो बात साधारण है — पर यदि किसी स्त्री ने प्रशंसा कर दी, तब तो व्यक्ति जान लुटाने को तैयार हो जाता है। इसी तरह यदि पुरुष किसी स्त्री के रूप की प्रशंसा कर दे, तो फिर बात वहीं खत्म नहीं होती… शुरू होती है। प्रशंसा एक ऐसी कब्र है जो आपकी बुराइयों को ढक लेती है और आपकी असली पहचान को छुपा देती है। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि जो व्यक्ति आपकी प्रशंसा कर रहा है, उसकी हर “वाह-वाह” के पीछे कोई न कोई स्वार्थ छिपा होता है। हम तो बस मस्त हैं अपनी प्रशंसा में — हमारी वाह-वाह हो रही है, बस यही काफी है। जिस दिन आपका ओहदा, पद या पैसा खत्म हो जाएगा, उसी दिन यही प्रशंसा आपको ग्लानि देने लगेगी। दरअसल, प्रशंसा में छिपे झूठ को जो समझ जाए, वही जीवन में सच्चा ज्ञानी है। प्रशंसा इतनी छलपूर्ण होती है कि जैसे समुद्र किनारे बैठकर उसकी गहराई का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता, वैसे ही प्रशंसा से ग्रस्त व्यक्...

कामना से ईश्वर तक

चित्र
कामना से ईश्वर तक लेखक : विनय तिवारी  जहाँ इच्छा का अंत, वहीं ईश्वर का आरंभ हर कोई अपनी आकांक्षा की पूर्ति करना चाहता है। संसार में ऐसा कोई नहीं है जिसकी कोई न कोई कामना न हो। गृहस्थ को धन की, साधु को भक्ति की, भक्त को भगवान की, भूखे को भोजन की, रोगी को दवा की, वृक्ष को ऊपर उठने की, शेर को शिकार की, पक्षियों को दाने की और धरती को बादल की आकांक्षा होती है। इन सबके बीच केवल मनुष्य ही है जो अपनी कामना को शब्द दे सकता है — बाकी जीव बस उसे जीते हैं। जब कामना पूरी होती है तो मनुष्य प्रसन्न होकर उसे “ईश्वर की कृपा” कहता है, पर जब नहीं होती — तो निराश होकर दोषारोपण करने लगता है। वह स्वयं को दोषी नहीं मानता, और यदि कोई दूसरा दोष नहीं लेता, तो अंततः किसी अदृश्य शक्ति पर दोष मढ़ देता है। यहीं से नकारात्मकता का जन्म होता है। जब मन में नकारात्मकता बढ़ती है, तब हम भी एक अदृश्य “सकारात्मक शक्ति” — ईश्वर — को मानने पर विवश हो जाते हैं। यही “होना या न होना” — ईश्वरीय सोच को जन्म देता है। ईश्वर को समय-समय पर अनेक ऋषियों, मनीषियों और दर्शनशास्त्रियों ने विभिन्न रूपों में व्यक्त किया है, प...

प्रेम: जहां दबाव नहीं होता

चित्र
प्रेम: जहाँ दबाव नहीं होता लेखक : विनय तिवारी  प्रेम दो व्यक्तियों के बीच की वह भावना है, जो आत्मा को स्पर्श कर आनंद प्रदान करती है। जिस व्यक्ति से बात करते हुए मन मुस्कुरा उठे, जिसका नाम लेते ही चेहरा खिल जाए, और जिसकी उपस्थिति से भावनाएँ जाग उठें — वही सच्चा प्रेम है। माँ का पुत्र या पुत्री से प्रेम, पति का पत्नी से, पत्नी का पति से प्रेम, पिता का संतान से, शिक्षक का शिष्य से, या दो सच्चे मित्रों का प्रेम — सभी का सार एक ही है — निर्मल आनंद। जहाँ दबाव है, वहाँ प्रेम नहीं, समझौता है। मालिक यदि मजदूर पर दबाव डालता है, तो वह श्रम का संबंध है, प्रेम का नहीं। पति या पत्नी यदि एक-दूसरे पर दबाव डालें, तो वह धन या आवश्यकता का बंधन है, स्नेह का नहीं। मित्र यदि मित्र पर दबाव बनाए, तो वह रहस्य का सौदा है, आत्मीयता का नहीं। प्रेम कभी दबाव में नहीं चलता। और यदि कोई दबाव में रहकर भी प्रेम के नाम पर जी रहा है, तो वह प्रेम नहीं — निर्भरता का सौदा है।

ऊर्जा और संयम

चित्र
ऊर्जा और संयम लेखक - विनय तिवारी  ऊर्जावान व्यक्ति उस प्राकृतिक शक्ति का स्वामी होता है, जो उसे प्रकृति उसकी शारीरिक तपस्या के फलस्वरूप प्रदान करती है। चमकता हुआ मस्तिष्क, होठों पर हल्की मुस्कान, मधुर वाणी और शरीर में कोयले की तरह धधकता रक्त — साथ ही उतनी ही शीतल मृदुभाषा — यही एक श्रेष्ठ ऊर्जावान व्यक्ति के व्यक्तित्व की पहचान है। कहा जाता है कि एक समय बाली ने हनुमान को युद्ध की चुनौती दी थी। बाली के पास यह वरदान था कि सामने वाले योद्धा का आधा बल उसके शरीर में समा जाता था। उस समय हनुमान ध्यानमग्न थे, अतः उन्होंने युद्ध को अगले दिन के लिए टाल दिया। प्रातःकाल जब वे युद्ध के लिए तैयार हुए, तभी ब्रह्मा जी प्रकट हुए और बोले — “हे वायुपुत्र! अपनी शक्ति का केवल दसवां भाग ही साथ ले जाना।” हनुमान ने आज्ञा का पालन किया। जैसे ही बाली उनके सम्मुख आया, हनुमान की ऊर्जा की तीव्रता से उसका शरीर फटने लगा। वह उस शक्ति को धारण करने में असमर्थ था। तब बाली ने हाथ जोड़कर क्षमा मांगी और कहा — “आपके पास इतना बल होते हुए भी आप इतने शांत और शालीन हैं — यही आपकी वास्तविक शक्ति है।” बल का प्रयोग ...