कामना से ईश्वर तक
कामना से ईश्वर तक
लेखक : विनय तिवारी
जहाँ इच्छा का अंत, वहीं ईश्वर का आरंभ
हर कोई अपनी आकांक्षा की पूर्ति करना चाहता है। संसार में ऐसा कोई नहीं है जिसकी कोई न कोई कामना न हो।
गृहस्थ को धन की, साधु को भक्ति की, भक्त को भगवान की, भूखे को भोजन की, रोगी को दवा की, वृक्ष को ऊपर उठने की, शेर को शिकार की, पक्षियों को दाने की और धरती को बादल की आकांक्षा होती है।
इन सबके बीच केवल मनुष्य ही है जो अपनी कामना को शब्द दे सकता है — बाकी जीव बस उसे जीते हैं।
जब कामना पूरी होती है तो मनुष्य प्रसन्न होकर उसे “ईश्वर की कृपा” कहता है, पर जब नहीं होती — तो निराश होकर दोषारोपण करने लगता है। वह स्वयं को दोषी नहीं मानता, और यदि कोई दूसरा दोष नहीं लेता, तो अंततः किसी अदृश्य शक्ति पर दोष मढ़ देता है।
यहीं से नकारात्मकता का जन्म होता है।
जब मन में नकारात्मकता बढ़ती है, तब हम भी एक अदृश्य “सकारात्मक शक्ति” — ईश्वर — को मानने पर विवश हो जाते हैं।
यही “होना या न होना” — ईश्वरीय सोच को जन्म देता है।
ईश्वर को समय-समय पर अनेक ऋषियों, मनीषियों और दर्शनशास्त्रियों ने विभिन्न रूपों में व्यक्त किया है, परंतु सबसे दृढ़ और गहन परिभाषा “आंतरिक भगवान” की है।
वास्तव में, जिसने ईश्वर को अमूर्त रूप में जाना, उसने परम शांति प्राप्त की।
बुद्ध का विचार यहाँ सर्वाधिक सार्थक प्रतीत होता है — उन्होंने कहा, “अपने भीतर झाँको, अपने आप को जानो।”
जिसने मन के बाहर के भगवान को जानने का प्रयत्न किया, वह उलझता चला गया।
जब हम बाहरी भगवान की ओर भागते हैं, तब हमारे भीतर की शांति खो जाती है और नकारात्मकता बढ़ने लगती है।
द्रौपदी और श्रीकृष्ण का प्रसंग इसका उत्तम उदाहरण है —
जब द्रौपदी ने पुकारा, “हे द्वारकाधीश, मेरी रक्षा करो,” तो कृष्ण ने कहा —
> “तुमने मुझे द्वारका में पुकारा, इसलिए मुझे द्वारका से आना पड़ा।
यदि तुम मुझे अपने भीतर पुकारतीं, तो मैं उसी क्षण उपस्थित होता।”
अर्थात, ईश्वर बाहर नहीं — हमारे भीतर है।
हम जिस मूर्ति को भगवान समझते हैं, वह तो मात्र एक माध्यम है — उस ब्रह्म तक पहुँचने का।
पर हम माध्यम को ही लक्ष्य मान बैठते हैं, इसलिए असफल रहते हैं।
कामना की पूर्ति हो तो “सही”, न हो तो “गलत” — यही मनुष्य का तराजू है।
कभी कृष्ण सही लगते हैं, कभी शिव, कभी राम, तो कभी किसी चबूतरे पर बैठे बाबा जी।
यह मार्ग जनमानस के लिए इसलिए सरल है क्योंकि इसमें ज्ञान की आवश्यकता नहीं — बस भीड़ के साथ चलना होता है।
परंतु यही भीड़ बार-बार नया मार्ग ढूंढती रहती है, और अंततः भटक जाती है।
ज्ञान का मार्ग सीधा ब्रह्म तक जाता है, पर यह कठिन है — इसमें आत्मसंयम चाहिए, तर्क चाहिए, और हर चुनौती से स्वयं जूझने का साहस चाहिए।
आम जनमानस इस झंझट में नहीं पड़ना चाहता, इसलिए वह मूर्तिपूजा, भूत-प्रेत और देवी-देवताओं की कथाओं में शरण ले लेता है।
जब उसकी कामना पूरी नहीं होती, तो मस्तिष्क किसी मनगढ़ंत कहानी में किरदार खोज लेता है — और उसी में शांति अनुभव करता है।
यही कारण है कि मनुष्य भूत, देवी या अदृश्य शक्ति में विश्वास करने लगता है — क्योंकि उसे किसी कारण की आवश्यकता होती है।
जो धार्मिक है, वही भूत या देवी शक्तियों को भी मानता है —
क्योंकि इन सबका मूल “धर्म” ही है।
हमने भूतों को इतना माना कि वे एक ब्रांड बन गए — अब फिल्म इंडस्ट्री भी उन्हीं से करोड़ों कमा रही है।
सच्चाई यह है —
जब हमें अपने दुःख का कारण नहीं मिलता, तब हम दोष “किसी” को देना चाहते हैं —
और जब वह “कोई” नहीं मिलता...
तब हम कहते हैं —
"कोई तो है"
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