प्रशंसा: एक धीमा ज़हर

🪶 प्रशंसा: एक धीमा ज़हर
✍️ लेखक — विनय तिवारी

किसी को जीतना है तो उसकी प्रशंसा करो। वह धीरे-धीरे अपनी समझ, अपनी सोच और कभी-कभी अपनी आत्मा तक आपके कदमों में रख देगा।
और हां, यदि पुरुष किसी की प्रशंसा करे तो बात साधारण है — पर यदि किसी स्त्री ने प्रशंसा कर दी, तब तो व्यक्ति जान लुटाने को तैयार हो जाता है। इसी तरह यदि पुरुष किसी स्त्री के रूप की प्रशंसा कर दे, तो फिर बात वहीं खत्म नहीं होती… शुरू होती है।

प्रशंसा एक ऐसी कब्र है जो आपकी बुराइयों को ढक लेती है और आपकी असली पहचान को छुपा देती है।
लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि जो व्यक्ति आपकी प्रशंसा कर रहा है, उसकी हर “वाह-वाह” के पीछे कोई न कोई स्वार्थ छिपा होता है।
हम तो बस मस्त हैं अपनी प्रशंसा में — हमारी वाह-वाह हो रही है, बस यही काफी है।

जिस दिन आपका ओहदा, पद या पैसा खत्म हो जाएगा, उसी दिन यही प्रशंसा आपको ग्लानि देने लगेगी।
दरअसल, प्रशंसा में छिपे झूठ को जो समझ जाए, वही जीवन में सच्चा ज्ञानी है।

प्रशंसा इतनी छलपूर्ण होती है कि जैसे समुद्र किनारे बैठकर उसकी गहराई का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता, वैसे ही प्रशंसा से ग्रस्त व्यक्ति अपने सामने वाले के स्वभाव और चरित्र का सही आकलन नहीं कर पाता।

प्रशंसा उसी को अच्छी लगती है, जिसके पास धन या पद बिना मेहनत के आया हो।
मेहनती और ज्ञानी व्यक्ति तो वहां से चला जाता है जहां बार-बार प्रशंसा की जाती हो।

प्रशंसा उस ओढ़नी की तरह है जो बुरे से बुरे व्यक्ति का चेहरा ढक देती है।
और प्रशंसा पाने वाला व्यक्ति यह मान बैठता है कि वह सभी पापों से मुक्त हो गया है।
पर संसार सब जानता है — कि आपकी प्रशंसा क्यों हो रही है।

प्रशंसा बुद्धि का हरण कर लेती है।
जो आपकी प्रशंसा करता है, वही आपको सबसे प्यारा लगने लगता है।
मूर्ख व्यक्ति की भी यदि प्रशंसा कर दी जाए, तो वह अपने आप को ब्रह्मांड का महा ज्ञानी समझने लगता है।
और जिस व्यक्ति को बार-बार सराहा जाए, वह अपने आप को अवतारी पुरुष मानने लगता है।

वह भूल जाता है कि प्रशंसा उसकी योग्यता की नहीं, बल्कि उसके पद या धन की हो रही है।
स्वार्थी व्यक्ति प्रशंसा करने में कोई कसर नहीं छोड़ता, क्योंकि वही उसकी सबसे सस्ती पूंजी है।

प्रशंसा एक “धीमा ज़हर” है — जो धीरे-धीरे विवेक को सुन्न कर देता है।
जब तक आप इस आभूषण को धारण किए रहते हैं, तब तक आपका ज्ञान आपके मस्तिष्क की काल कोठरी में बंद रहता है।
सीखने का दरवाज़ा बंद हो जाता है, और आप स्वयं को समस्त ज्ञान का आविष्कारक मानने लगते हैं।

मूर्ख व्यक्ति यदि अपनी झूठी प्रशंसा सुन ले, तो अपने ही झूठ को सच साबित करने में लग जाता है।
और यही संसार की सबसे बड़ी विडंबना है —
यहां झूठ पर तालियां बजती हैं और सच पर पत्थर बरसते हैं।

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