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धनीराम ब्रह्मचारी : भक्ति, त्याग और आस्था की प्रतिमूर्ति

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धनीराम ब्रह्मचारी : भक्ति, त्याग और आस्था की प्रतिमूर्ति ✍️ लेखक विनय तिवारी मध्यप्रदेश के दतिया नगर के निकट स्थित ग्राम बुधेड़ा में एक बालक ने जन्म लिया। नाम था — धनीराम। पाँच वर्ष की आयु, आँखों में जिज्ञासा, मन में चंचलता और माता-पिता का अपार स्नेह। घर में लाड़-प्यार की कोई कमी न थी। खेत, खलिहान, गौशाला और मिट्टी की सोंधी खुशबू के बीच उसका बचपन हँसते-खेलते बीत रहा था। एक दिन दोपहर की बेला में उसे भूख लगी। घर में माता-पिता दिखाई नहीं दिए। माँ सुबह से खीर बनाने की बात कह रही थी— “आज खीर बनाऊँगी, सबसे पहले तुझे ही खिलाऊँगी।” बालक का मन उसी खीर के स्वाद में डूबा था। वह माँ को ढूँढते-ढूँढते घर से बाहर निकल आया। रास्ते में एक साधु खड़ा था। उसकी आँखों में गहराई थी, जैसे वह बालक को पहचानता हो।  उसने धनीराम को देखा और मुस्कुराकर कहा — “यह बालक साधारण नहीं।” लोगों की मान्यता है कि वही क्षण उसकी नियति का मोड़ था। साधु उसे अपने साथ ले गया। गाँव में जब यह समाचार पहुँचा, तो घर शोक से भर गया। माँ रोते-रोते बेसुध हो गई। कहते हैं, खीर की वह हाँडी यूँ ही पड़ी रह गई। पिता मंदिर-मंदिर भट...

मौन में जागती ऊर्जा

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🌌 मौन में जागती ऊर्जा ✍️ लेखक विनय तिवारी  ( जहाँ शरीर सोता है, वहाँ चेतना पहरा देती है) जब मनुष्य जाग्रत अवस्था में होता है, तब उसकी रक्षा के अनेक दृश्य साधन सक्रिय रहते हैं—आँखें देखती हैं, कान सुनते हैं, हाथ-पाँव खतरे से बचाते हैं। परंतु जैसे ही मनुष्य नींद या गहरे ध्यान में प्रवेश करता है, एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है—उस समय हमारी रक्षा कौन करता है? वैज्ञानिक दृष्टि कहती है कि नींद में भी हमारा मस्तिष्क पूर्णतः निष्क्रिय नहीं होता। शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र, स्वायत्त तंत्रिका तंत्र और मस्तिष्क की सतर्कता प्रणाली निरंतर कार्यरत रहती है। वे सूक्ष्म स्तर पर हमारी सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। यही हमारी जैविक ढाल है। परंतु अनुभव की दुनिया केवल विज्ञान की सीमाओं में बंधी नहीं है। साधना की परंपराएँ कहती हैं कि मनुष्य के शरीर के चारों ओर एक सूक्ष्म ऊर्जा-क्षेत्र विद्यमान होता है—एक ऐसा आभामंडल, जो उसकी आंतरिक अवस्था के अनुसार सक्रिय या मंद होता रहता है। इस सूक्ष्म ऊर्जा को समझने के लिए इसे तीन स्तरों में अनुभव किया जा सकता है— पहला स्तर  शरीर के अत्यंत समीप होता है। यह ...