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ईश्वर तत्व और विश्वास का दर्शन

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ईश्वर तत्व और विश्वास का दर्शन ✍️लेखक : विनय तिवारी     जब सारे रिश्ते टूटते हैं, तब ईश्वर तत्व का रिश्ता जुड़ता है यह केवल एक कहावत नहीं, बल्कि मनुष्य की आंतरिक यात्रा का सत्य है। जब तक व्यक्ति "मेरा-तेरा", "यह मेरा है, वह मेरा है" की भावना में जीता है, तब तक वह बाहरी रिश्तों से बंधा रहता है और ईश्वर तत्व पर निर्भरता का अनुभव नहीं करता। लेकिन जिस दिन कोई साथ नहीं देता, रिश्ते छूटने लगते हैं, सहारे टूटते हैं — उसी दिन मनुष्य स्वयं में झाँकता है। यही आत्म-अवलोकन ईश्वर तत्व की खोज बन जाता है। यह भी सत्य है कि सारे तभी रिश्ते टूटते हैं, तो कोई एक ऐसा रिश्ता जुड़ता है, जिसमें पूर्ण विश्वास जन्म ले लेता है। वह रिश्ता किसी मनुष्य से भी हो सकता है और किसी आराध्य से भी। विश्वास ही ईश्वर की सृष्टि है सत्य तो यह है कि किसी मूर्ति में, किसी प्रतीक में, किसी आराध्य रूप में स्वयं आत्मा नहीं होती — आत्मा हमारे विश्वास में होती है। हमारा विश्वास ही परमात्मा की थीसिस (आधार-संरचना) को जन्म देता है। अक्सर देखा जाता है कि लोग एक-दूसरे के धर्म या प्रतीकों का अपमान करते हैं,...

स्मृति : अवचेतन में सुरक्षित समय

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स्मृति : अवचेतन में सुरक्षित समय लेखक : विनय तिवारी  मनुष्य जो देखता है, सुनता है और अनुभव करता है—वह कभी न कभी स्मृति बन ही जाता है। यह भ्रम है कि हम बहुत कुछ भूल जाते हैं। वास्तव में हम भूलते नहीं, हम केवल स्मृतियों तक पहुँचना छोड़ देते हैं।  स्मृति का वास्तविक निवास स्थान चेतन मन नहीं, बल्कि अवचेतन है।    हम किसी दृश्य, ध्वनि या अनुभव से गुजरते हैं, तो वह पहले चेतन मन (Conscious Mind) में प्रवेश करता है। यदि उस अनुभव पर हमारा ध्यान क्षणिक रहा, तो वह अल्पकालिक स्मृति बनकर लुप्त-सी हो जाती है। किंतु जिस अनुभव को हम बार-बार दोहराते हैं, भावनात्मक रूप से उससे जुड़ते हैं या उस पर विशेष ध्यान केंद्रित करते हैं—वही स्मृति दीर्घकालिक स्मृति (Long-Term Memory) में परिवर्तित हो जाती है। यही स्मृतियाँ “कभी न मिटने वाली” प्रतीत होती हैं। दार्शनिक रूप से देखें तो स्मृति समय का संग्रहालय है। नई स्मृतियाँ आती रहती हैं और पुरानी स्मृतियाँ मानो नीचे दबती जाती हैं। पर दबना नष्ट होना नहीं है। जैसे पुस्तकालय में पुरानी किताबें ऊपर न दिखें, पर मौजूद रहती हैं। जैसे ही कोई...