ईश्वर तत्व और विश्वास का दर्शन
ईश्वर तत्व और विश्वास का दर्शन ✍️लेखक : विनय तिवारी जब सारे रिश्ते टूटते हैं, तब ईश्वर तत्व का रिश्ता जुड़ता है यह केवल एक कहावत नहीं, बल्कि मनुष्य की आंतरिक यात्रा का सत्य है। जब तक व्यक्ति "मेरा-तेरा", "यह मेरा है, वह मेरा है" की भावना में जीता है, तब तक वह बाहरी रिश्तों से बंधा रहता है और ईश्वर तत्व पर निर्भरता का अनुभव नहीं करता। लेकिन जिस दिन कोई साथ नहीं देता, रिश्ते छूटने लगते हैं, सहारे टूटते हैं — उसी दिन मनुष्य स्वयं में झाँकता है। यही आत्म-अवलोकन ईश्वर तत्व की खोज बन जाता है। यह भी सत्य है कि सारे तभी रिश्ते टूटते हैं, तो कोई एक ऐसा रिश्ता जुड़ता है, जिसमें पूर्ण विश्वास जन्म ले लेता है। वह रिश्ता किसी मनुष्य से भी हो सकता है और किसी आराध्य से भी। विश्वास ही ईश्वर की सृष्टि है सत्य तो यह है कि किसी मूर्ति में, किसी प्रतीक में, किसी आराध्य रूप में स्वयं आत्मा नहीं होती — आत्मा हमारे विश्वास में होती है। हमारा विश्वास ही परमात्मा की थीसिस (आधार-संरचना) को जन्म देता है। अक्सर देखा जाता है कि लोग एक-दूसरे के धर्म या प्रतीकों का अपमान करते हैं,...