कहानी: "रामसेवक — जीवन का लोकगीत"
कहानी: "रामसेवक — जीवन का लोकगीत"
लेखक: विनय तिवारी
23 अगस्त 1930 की प्रातः बेला थी।
ग्राम बुधेड़ा, जिला दतिया एक बालक ने जन्म लिया।
घर में मंगल ध्वनि गूंजी — नाम रखा गया रामसेवक।
माता तुलसी और पिता पन्ना के चेहरे पर अपार आनंद था,
जैसे ईश्वर ने उनके जीवन को धन्य कर दिया हो।
रामसेवक तीन भाइयों और एक बहन में सबसे छोटे थे।
बचपन में ही जीवन ने कठिनाई की चादर ओढ़ा दी —
बड़े भाई ब्रजकिशोर हनुमानजी की अनन्य भक्त थे। उन्होंने गांव में ही हनुमान मंदिर (इच्छापूर्ण हनुमान) का निर्माण करवाया। उनके बाल काल में ही बड़े भाई और माता-पिता स्वर्ग सिधार गए।
बीच वाले भाई धनीराम 5 वर्ष की आयु में भी अचानक से गायब हो गए कुछ वर्षों बाद पता चला कोई साधु उन्हें ले गया था। अब वह बड़े हो चुके थे और पीतांबरा माई की सेवा करने लगे थे।
अब इस नन्हे बालक को जीवन की नाव खुद खेनी थी।
बहन चिरौंजी (जिनकी ससुराल गढ़ा गांव में थी) ने मां का रूप लिया।
कभी बुधेड़ा, कभी गढ़ा —
रामसेवक का बचपन दो गांवों की माटी में बीता।
कभी नदी के घाट पर, कभी खेत की मेड़ पर —
वे जीवन से जूझते हुए भी मुस्कुराते रहे।
पढ़ाई का अवसर भले न मिला,
पर शरीर में शक्ति और मन में आत्मविश्वास प्रचुर था।
वे पहलवानी में निपुण थे — दूध, दही और छाछ उनके जीवन का रस था।
जब भी अखाड़े में उतरते थे चारों तरफ उनका ही नाम गूंजता था।
बीस वर्ष की आयु में उनका विवाह हुआ,
और किस्मत ने नया अध्याय लिखा।
विवाह के बाद वे ध्वानी गांव में आ बसे,
जहाँ अपने हिस्से की जमीन संभालते हुए
एक नई पहचान गढ़ने लगे।
उनकी साइकिल की घंटी गांव के हर बूढ़े को याद है —
तीस कोस दूर तक चल जाना उनके लिए मामूली बात थी।
वे कहते, “साइकिल से चलो बेटा, तन भी हलका, मन भी।”
धीरे-धीरे जीवन में सुख-शांति आई।
तीन पुत्र — उमाशंकर, श्रीराम, दुर्गा प्रसाद
और चार पुत्रियाँ — तारा, रमा, शिबा, बल्ली,
इन सबमें उन्होंने स्नेह, अनुशासन और आत्मसम्मान बोया।
पर घर में दादी कुंवरबाई का रौब हमेशा चलता था,
दादा जी बस मुस्कुरा देते —
“जहाँ कुंवरबाई बोले, वहाँ तर्क न चले!”
कुंवरबाई की ममता और मजबूत व्यक्तित्व ने हमेशा घर को सँभाला। उनके ससुर गोविंद, जिन्हें दद्दा कहते थे, भी रामसेवक के लिए एक प्रेरणा थे।
दादाजी की मौसी, जो भलका गांव में रहती थीं, उनके एक ही संतान थी जमुनाबाई। जमुना बाई के कोई भाई नहीं था। इसीलिए दादाजी की मौसी ने उन्हें गोद ले लिया।
और अपने हिस्से की चल-अचल संपत्ति दादाजी के नाम कर दी।
रामसेवक जी खेती बड़ी लगन से करते।
तीन गांवों में जमीन थी।
भलका, बुंधेडा, ध्वानी।
पर उनका असली गर्व था — संगीत।
बहन चिरौंजी ने जब उनका झुकाव देखा,
तो हरमोनियम मंगवाया और कहा,
“अब यह तेरे स्वर तेरी पहचान होंगे।”
यही स्वर आगे चलकर रामसेवक संगीत पार्टी बने।
दिल्ली तक उनके सुर पहुंचे —
प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उन्हें पुरस्कार प्रदान किया।
पूरा गांव गर्व से भर गया।
उनके साथी थे खुसाली, ठाकुरदास, पंचम और प्रागी,
जो उनके साथ कार्यक्रमों में सुर मिलाते।
उनकी धुनों में लोक और भक्ति का संगम था।
लोग कहते — “जीजा की तान में आत्मा उतरती है।”
धीरे-धीरे उम्र ढलने लगी,
पर उनका हृदय वही रहा — दयालु और सरल।
कई बार किसी जरूरतमंद को देखकर भर भर के अनाज दे देते थे।
उनकी भोलापन भरी दया ही उनकी पहचान बन गई।
समय बीता, नाती-पोते हुए।
बे सदैव शिक्षा देते — प्रेम से रहना,
“बच्चो, जीवन को हंसते हुए जीना,
संघर्ष चाहे जितना बड़ा हो, एक दूसरे का साथ मत छोड़ना।”
13 मई 2010 की शाम 5:15 पर
वे शांति से इस संसार को छोड़ गए।
पूरा गांव ध्वानी शोक में डूब गया।
लोग हाथ जोड़कर बोले —
“जीजा तो चले गये, पर काम कोई अधूरा न छोड़े गए।”
हम सभी बच्चों को कहानी सुनाया करते थे।
आज जब मैं,
उनकी पुरानी साइकिल, टूटी ऐनक, और हरमोनियम को देखता हूँ,
तो लगता है जैसे वे आज भी यहीं हैं —
संगीत के सुर में, उन कहानियों में
और अंत में बस इतना ही कहूंगा —
“सेवा ही सबसे बड़ा गीत है,
और प्रेम ही जीवन का सुर।”
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