मंत्र और विश्वास
🔶 मंत्र और विश्वास
लेखक - विनय तिवारी
जहाँ शब्द नहीं, विश्वास बोलता है
हर व्यक्ति जानता है कि मंत्रों में शक्ति होती है।
परंतु प्रश्न यह है — मंत्र आखिर है क्या?
वास्तव में मंत्र कोई रहस्यमयी जादू नहीं,
बल्कि संस्कृत भाषा में किसी देवता की प्रशंसा मात्र है।
जब हम कहते हैं —
“आप महान हैं, आप ही सर्वशक्तिमान हैं,
आपके हाथों में धनुष है, कंधों पर शौर्य,
गले में विशाल नाग है, सिर पर चंद्रमा है,
आपने असुरों का संहार किया, सत्य की रक्षा की…”
तो यह भी एक मंत्र ही है — बस अपनी भाषा में कहा गया।
भगवान तब भी प्रसन्न होते हैं,
क्योंकि उन्हें भाषा नहीं, भावना चाहिए।
परंतु हम इसे मंत्र नहीं मानते,
क्योंकि हमारा विश्वास मंत्र के शब्दों में है,
उसके अर्थ या भाव में नहीं।
और यहीं पूरी बात छिपी है —
सारा खेल विश्वास का है।
जब किसी बात, किसी शक्ति या किसी देवता में
हमारा विश्वास पूर्ण हो जाता है,
तो कार्य अपने आप होने लगते हैं।
और फिर हम प्रसन्न होकर कहते हैं —
“मंत्र ने काम कर दिया।”
पर वास्तव में,
काम मंत्र ने नहीं,
हमारे अटल विश्वास ने किया होता है।
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