स्मृति : अवचेतन में सुरक्षित समय

स्मृति : अवचेतन में सुरक्षित समय
लेखक : विनय तिवारी 


मनुष्य जो देखता है, सुनता है और अनुभव करता है—वह कभी न कभी स्मृति बन ही जाता है। यह भ्रम है कि हम बहुत कुछ भूल जाते हैं। वास्तव में हम भूलते नहीं, हम केवल स्मृतियों तक पहुँचना छोड़ देते हैं। 

स्मृति का वास्तविक निवास स्थान चेतन मन नहीं, बल्कि अवचेतन है।
   हम किसी दृश्य, ध्वनि या अनुभव से गुजरते हैं, तो वह पहले चेतन मन (Conscious Mind) में प्रवेश करता है। यदि उस अनुभव पर हमारा ध्यान क्षणिक रहा, तो वह अल्पकालिक स्मृति बनकर लुप्त-सी हो जाती है। किंतु जिस अनुभव को हम बार-बार दोहराते हैं, भावनात्मक रूप से उससे जुड़ते हैं या उस पर विशेष ध्यान केंद्रित करते हैं—वही स्मृति दीर्घकालिक स्मृति (Long-Term Memory) में परिवर्तित हो जाती है। यही स्मृतियाँ “कभी न मिटने वाली” प्रतीत होती हैं।
दार्शनिक रूप से देखें तो स्मृति समय का संग्रहालय है। नई स्मृतियाँ आती रहती हैं और पुरानी स्मृतियाँ मानो नीचे दबती जाती हैं। पर दबना नष्ट होना नहीं है। जैसे पुस्तकालय में पुरानी किताबें ऊपर न दिखें, पर मौजूद रहती हैं। जैसे ही कोई  ट्रिगर्स (Triggers): मौसम, कोई खास गंध, या किसी का नाम एक 'चाबी' की तरह काम करता है जो उस पुराने फोल्डर को खोल देता है। इसे "Associative Memory" कहते हैं, जहाँ एक विचार दूसरे से जंजीर की तरह जुड़ा होता है।

स्वप्न : अवचेतन की भाषा

स्वप्न इसी अवचेतन का संवाद है।
अक्सर हम सपनों में उन लोगों को देखते हैं जिनसे मिले हुए वर्षों बीत चुके होते हैं—चाहे वे जीवित हों या न रहे हों। वैज्ञानिक दृष्टि से इसका कारण यह है कि दिन में किसी स्तर पर, भले ही अनजाने में, मस्तिष्क ने उनसे जुड़ी कोई सूचना ग्रहण कर ली होती है। कानों से सुनी गई बात, भले ही चेतन मन ने उस पर ध्यान न दिया हो, अवचेतन ने उसे संग्रहित कर लिया होता है।
नींद के दौरान जब चेतन मन शांत हो जाता है, तब अवचेतन अपनी संचित स्मृतियों को चित्रों में प्रस्तुत करता है। इसलिए स्वप्न में वही पुराना घर, वही समय, वही वातावरण जीवंत हो उठता है। हमें लगता है—“आज ही सपना क्यों आया?”
जबकि सच यह है कि वह स्मृति वर्षों से हमारे भीतर थी, बस आज उसे संकेत मिल गया।
दार्शनिक रूप में कहा जाए तो—
स्वप्न स्मृति की आत्मकथा हैं, जो दिन के शोर में बोल नहीं पातीं।

आकृति और ध्वनि : स्मृति के स्तंभ

मस्तिष्क की एक अत्यंत रोचक वैज्ञानिक विशेषता यह है कि वह शब्दों की अपेक्षा आकृतियों और ध्वनियों को अधिक सटीकता से याद रखता है। किसी व्यक्ति की आकृति देखते ही उसके साथ जुड़े गुण, व्यवहार और घटनाएँ स्वतः स्मरण में आ जाती हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि स्मृतियाँ अलग-अलग नहीं, बल्कि समूहों (Memory Associations) में संग्रहीत होती हैं।
यही कारण है कि जब हम किसी वस्तु के बारे में सोचते हैं—जैसे तोता—तो पहले उसकी आकृति उभरती है, दिमाग T-O-T-A अक्षर नहीं देखता, बल्कि एक हरी आकृति और लाल चोंच की छवि बनाता है।
फिर उसका रंग, उसकी आवाज़, उसका स्वभाव और उससे जुड़े अनुभव। सोच भी पहले दृश्य बनाती है, फिर विचार।
दार्शनिक स्तर पर यह संकेत देता है कि मनुष्य का चिंतन भी मूलतः दृश्यात्मक है; शब्द बाद में आते हैं।

क्षणिक स्मृति और भ्रम

कभी-कभी हमें ऐसा अनुभव होता है कि जो अभी देखा या सुना, वह पहले भी हो चुका है। वैज्ञानिक रूप से यह दो निकटवर्ती स्मृतियों के बीच के सूक्ष्म अंतराल का परिणाम होता है। एक ही दृश्य या ध्वनि यदि बहुत कम समय में दो बार दर्ज हो जाए, तो मस्तिष्क उसे “पहले से जाना हुआ” मान लेता है। कभी मस्तिष्क की एक आंख या एक हिस्सा जानकारी को दूसरे हिस्से से कुछ मिलीसेकंड पहले प्रोसेस कर लेता है, जिससे हमें लगता है कि यह घटना पहले भी हो चुकी है। 
कुछ भी एक सीधी रेखा में नहीं है हम एक बार किसी को देखते हैं पलक झपकाने के बाद दुबारा देखते हैं जानकारी के दो बंडल बन जाते हैं दुनिया में हर चीज छोटे-छोटे टुकड़ों में है। इसी प्रकार सूचनाओं भी टुकड़ों में एक दूसरे से जुड़ी हई होती है एक को याद करते हैं दूसरी याद आ जाती है 
यही अनुभव कभी-कभी वर्षों पुरानी दब चुकी स्मृति के जागने से भी उत्पन्न होता है। तब कुछ देर बाद हमें स्पष्ट हो जाता है—
“हाँ, यह तो बहुत पहले हुआ था।”
दार्शनिक अर्थ में यह अनुभव बताता है कि समय रैखिक नहीं, बल्कि स्मृति में चक्रीय है।

निष्कर्ष

मनुष्य अपने भीतर अपना पूरा अतीत लेकर चलता है।
कुछ भी वास्तव में नष्ट नहीं होता—
सिर्फ़ सही संकेत का इंतज़ार करता है।
स्मृति मिटती नहीं,
वह बस मौन हो जाती है।
और मौन, सही क्षण पाकर,
सबसे ऊँची आवाज़ में बोलता है।

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