तीसरी अवस्था: "अर्धचेतन जीवन का सार"
तीसरी अवस्था: "अर्धचेतन जीवन का सार"
✍️लेखक : विनय तिवारी
🌿 विचार बीज — तीसरी अवस्था का सार
मनुष्य का जीवन तीन अवस्थाओं में बँटा है — जागृति, निद्रा और उनके बीच की रहस्यमयी अर्ध चेतन अवस्था। यही तीसरी अवस्था है, जहाँ मन न पूरी तरह बाहर रहता है, न भीतर — बस एक गहन सीमारेखा पर ठहर जाता है। यही वह अवस्था है जहाँ भय, प्रेम, जिज्ञासा और तप सब एक साथ जन्म लेते हैं। परंतु जो बिना ज्ञान के इस अवस्था में पहुँचता है, वह समाज की दृष्टि में “असामान्य” बन जाता है; और जो ज्ञानपूर्वक पहुँचता है, वह “ऋषि” कहलाता है।
लेख इस तीसरी अवस्था के आठ पड़ावों के माध्यम से यह बताता है कि देवत्व कोई दूरस्थ लक्ष्य नहीं, बल्कि ज्ञान, एकाग्रता और तर्क का संगम है। सच्चा धर्म किसी देवता की जय-जयकार में नहीं, बल्कि उसके आदर्शों को जीवन में जी लेने में है।
जो भय से नहीं, विश्वास से जिए — जो श्लोक में नहीं, सार में उतरे।
इस अवस्था में व्यक्ति न सोता है, न जागता है, बल्कि बीच में अटक जाता है; इसे ही तीसरी अवस्था कहते हैं। इस अर्धचेतन अवस्था को अंग्रेजी में सेमी-कॉन्शियस स्टेट भी कहते हैं। यह बड़ा ही रोचक है कि दुनिया का हर व्यक्ति इस अवस्था में पहुँचने के लिए लालायित रहता है—जो जाना चाहता है, वह जा नहीं पाता, और जो नहीं जाना चाहता, वह चला जाता है।
सत्य तो यह है कि बिना ज्ञान के इस अवस्था में पहुँचने के बाद, आपको समाज द्वारा प्रताड़ित किया जाएगा, क्योंकि आप गलत रास्ते से पहुँचे हैं। आप ऐसी हरकतें करोगे जो समाज के लिए कष्टकारी होंगी। आप तरह-तरह के किरदारों में पहुँचकर समाज की शांति भंग करोगे, उनमें डर स्थापित करोगे, और समाज को विवश करोगे कि वह आपसे बड़ी शक्ति को माने। इसी कारण आपको वापस जागृत अवस्था में लाया जाएगा।
इस तीसरी (अर्धचेतन) अवस्था को मैंने कुछ भागों में बाँटने का प्रयत्न किया है, जो इस प्रकार हैं। जिस प्रकार हम पहली कक्षा से पी.एच.डी. तक पढ़ते हैं, वैसे ही इस अर्ध चेतन अवस्था हैं।
आप कक्षा एक के विद्यार्थी को पीएचडी की किताबें नहीं पढ़ा सकते। ईश्वर तत्व पीएचडी का विषय है।
जो अज्ञानता से अचानक ही अर्ध चेतन में चला जाता है। उसको यह अवस्था भूत लगना जैसी लगने लगती है। क्योंकि अर्थ चेतन ज्ञानियों का विषय है इसीलिए अज्ञानियों को डर और भय हो जाता है
यहां अवस्थाएं और उनके प्रभाव दिए गए हैं
- डर या भय: (जैसे) भूत लगना।
- प्रेम में अलगाव (बिछड़ना): जब प्रेम बिछुड़ता है, तो मन किसी और के किरदार में घुसकर जीने लगता है।
- जिज्ञासावश: ('इसमें ऐसा है क्या?') – अर्ध चेतना के झटके आना।(झंका आना)
- मूर्खतापूर्ण एकाग्रता से: देवी-देवता आना।
- किरदार की एकाग्रता से: साधक जब अपने पात्र में पूरी तरह समा जाता है, यह भी उसी अवस्था का एक रूप है।
- अल्प ज्ञान से एकाग्रता: यहाँ व्यक्ति दूसरों के मस्तिष्क या भावनाओं को पढ़ने लगता है।
- तप (ज्ञान + एकाग्रता): तपस्वी, महात्मा, निर्विकार होना।
- ज्ञान + एकाग्रता + तार्किकता: यही पूर्णता की अवस्था है, जहाँ व्यक्ति ईश्वरत्व को छूता है।
सत्य तो यह है कि जहाँ हम देवता को पाने निकलते हैं, वहाँ देवता होता ही नहीं —
वहाँ केवल हमारी खोज की प्रतिध्वनि होती है।
फिर भी, हम अपने जीवन को किसी न किसी आदर्श के डर और आस्था में बुनते रहते हैं।
अब प्रश्न उठता है: हम गलत कहाँ हैं? हम तो सही करते हैं।
तो मैं बता दूँ: आप जिए ही नहीं। आपने पूरा जीवन भय में ही गुजार दिया—कभी इस देवता के आदर्श, कभी उस देवी के आदर्श। यह बात अलग है कि आप चले किसी के आदर्श पर नहीं।
हमने एक आदर्श कभी माना ही नहीं—'लेकिन मैं क्या करता, मुझे किसी देवता या देवी के बारे में बताया ही नहीं गया!' बस इतना बताया गया कि उनकी आरती करो, पूजा करो, देवता प्रसन्न हो जाएँगे। लेकिन हम उन्हें प्रसन्न करके करेंगे क्या? अपनी इच्छाओं की पूर्ति? सच तो यह है कि इच्छाएँ कभी पूर्ण नहीं होतीं, पर हम सदा भ्रम में बने रहते हैं। काम हो गया तो 'मेरे पुण्य कर्मों से', नहीं हुआ तो 'मेरे पूर्व जन्म के पाप कर्मों से'। बस, इसी में शांति प्राप्त करने की कोशिश करते हैं।
आप कभी आदर्श के आदर्शों पर चलो तो! या फिर आप "मूर्ख, खल, कामी" ही बने रहोगे। एक बात याद रखना: आप बार-बार जिसे दोहराते हैं, मस्तिष्क उसी को सच मान बैठता है, और हम जीवन भर मूर्ख, खल, कामी ही बने रहते हैं।
सच्चाई यही है: यदि आप उस अवस्था तक नहीं पहुँच सकते, तो जो पहुँचा है (समझो, वह उस विषय में पी.एच.डी. धारक है और उसकी ईश्वर पर रिसर्च है), बस उस देवता के आदर्श को पकड़ो। केवल संस्कृत में ही न उलझे रहो। उनके आदर्शों को हिंदी में अनुवाद करके जीवन में ढालो।
"श्लोक स्वाहा होते रहेंगे और हम मूर्ख बनते रहेंगे।"
यदि आपकी कोई प्रशंसा करे, तो आप कितनी बार सुनना चाहेंगे? एक समय के बाद आपको प्रशंसा से चिढ़ होने लगेगी। ऐसे ही समझो, श्लोक उनकी प्रशंसा तथा उनके कामों का वर्णन हैं। उन्हें बार-बार याद दिलाकर, उनकी जय-जयकार करके क्या साबित करना चाहते हो? कि हम सदा मूर्ख ही बने रहेंगे?
ज्ञान प्राप्त करना है। भय नहीं, विश्वास से जीना है।
शिव, राम, कृष्ण या विष्णु — जिसे मानो, एक को पूरी तरह मानो।
क्योंकि जो दस देवताओं में उलझा, वह कभी एक में विलीन नहीं हो पाया।
यही सच्चे धार्मिक संस्कार हैं—जो हमें अपने बच्चों को सिखाना चाहिए।
इसी छोटे से ही जीवन में सब कुछ सीखना है, करना है।
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